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मोतियाबिंद क्या है ?

हमारी उम्र ज्यो-त्यों बदती है , हमारी नज़र कमजोर होती जाती है | खास कर कम रोशनी या धुंधले माहौल मे | मोतियाबिंद आंखो के प्राक्रतिक क्रिस्लाइन लेंस को धुंधला या पीला कर देता है | जिस से यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है | यह रोशनी की किरणो को आंखो मे आसानी से प्रवेश करने से रोकता है |

अगर आपको मोतियाबिंद है तो आपकी नज़र धुंधली हो सकती है | उसके रंग उदास हो सकते है |रोशनी के प्रति संवेदनशीलता बड़ सकती है |या और पहले से अधिक पावर के चश्मो की आवश्यकता पड सकती है |

अगर मोतियाबिंद का सही इलाज नही किया गया तो बदती उम्र के साथ साथ आपकी नज़र कमजोर पड सकती है |

मोतियाबिंद का ऑपरेशन क्या है ?

मोतियाबिंद का ऑपरेशन आँखों के इलाज की आज की सबसे प्रचलित और प्रमाणित विधि है |

मोतियाबिंद के ऑपरेशन के समय डॉक्टर सबसे पहले धुंधले पड़े , बुढ़ापा ग्रस्त क्रिस्लाइन लेंस को निकाल देते है | उसके बाद आंखो मे एक इंट्राऑक्युलर लेंस आइओएल , लगा देते है |

क्या आपको हर चीज धुंधली नॅजर आती है ?

अधिक उम्र मे नज़र का धुंधलापन और रंगो का अस्वाभाविक दिखना एक सामान्य समस्या है | ऐसा हमारी आंखो के प्राक्रतिक लेन्सो मे बदलाव के कारण होता है | आंखो के प्राक्रतिक लेंस मुख्यतः पानी ओर प्रोटीन के बने होते है | ये आंखो से गुजरने वाली किरणो को आंखो के पीछे रेटिना पर फोकस करते है | ताकि आपको हर चीज़ की साफ ओर पैनी तस्वीर मिले |

उम्र बढ़ने के साथ प्राक्रतिक लेंस के भीतर के प्रोटीन की गुठली सी बड़ने लगती है ओर इस से लेंस के आगे धुंधलापन पैदा हो जाता है |

इस तरह लेंस आंखो से गुजरने वाली रोशनी को ठीक प्रकार से फोकस करने की क्षमता को खो देता है | ओर परिणामत: हर चीज़ धुंधली या रंग फीका नज़र आता है |

यह धुँधलापन मानसिक आघात या धूम्रपान ओर मध्यापन जैसे जोखिम भरे कारणों से भी हो सकता है |

लेसिक उपचार

चश्मा द्रष्टि से ज्यादा सामाजिक दोष है | चश्मा लगाना एक साधारण समस्या नहीं बल्कि कई समस्याओ की जड़ है चश्मा लगते ही माता-पिता मानसिक रूप से दुखी हो जाते है | खास तोर पर यदि चश्मा कन्या को लगता हो |

पिछले कई सालो मे वेज्ञानिको द्वारा चश्मे से मुक्ति पाने के विभिन्न उपाय तलाशे जैसे - कांटेक्ट लेंस तथा आंखो के अंदर लेंस प्रत्यारोपण | परंतु यह सभी उपाय परेशानियो को साथ मे लिये हुए थे | इन सभी के बाद लेसिक लेज़र की खोज , चश्मे तथा कांटेक्ट लेंस से मुक्ति पाने मे क्रांतिकारी परिवर्तन साबित हुई है| लेसिक यानी Laser Insitu Keratomileusis जिसमे आधुनिकतम तकनीक के इस्तेमाल के द्वारा उन सभी प्रक्रियाओ से होने वाली परेशानियो के बिना चश्मा तथा कांटेक्ट लेंस से मुक्ति पायी जाती है |

लेसिक प्रक्रियाओ के पूर्व कुछ बातो का विशेष ध्यान रखना चाहिये |

जैसे व्यक्ति की उम्र 19 साल से अधिक हो , उसका नंबर पिछले एक साल से स्थिर हो | उसे नेत्र सम्बंधी कोई अन्य बीमारी जैसे मोतियाबिंद कांचबिन्द या केरिटोकनस ना हो | गर्भावस्था मे लेसिक नहीं कराना चाहिये | क्यूकि हार्मोनो के असंतुलन के वजह से चश्मे का नंबर बदल सकता है | तथा लेज़र का दुष्प्रभाव गर्भ पर पड़ सकता है | डाइबीटिज़ मे भी परिणाम अनिश्चित रह सकता है |

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